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युक्तियुक्तकरण मामले में निलंबित BEO को मिली राहत, रिटायरमेंट के पहले सस्पेंशन हुआ निरस्त

बिलासपुर।  हाईकोर्ट से BEO को बड़ी राहत मिल गयी है। युक्तियुक्तकरण मामले में निलंबित बीईओ ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसके बाद कोर्ट ने अब बीईओ के पक्ष में फैसला सुनाया है। दरअसल  डौंडी विकासखंड के प्रभारी विकास खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) जय सिंह भारद्वाज का निलंबन छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया है। शासन ने उन्हें 11 जून 2025 को निलंबित किया था। उन पर युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया में अनियमितता बरतने का आरोप लगाया गया था। इस आदेश को उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव ने अदालत में दलील दी कि निलंबन आदेश छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के विपरीत पारित किया गया है। नियम 9 (1) और 9 (2) के अंतर्गत ही निलंबन संभव है, किन्तु प्रकरण में पारित आदेश इन दोनों प्रावधानों की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि बिना पर्याप्त आधार और विधिक प्रावधानों के उल्लंघन के साथ आदेश पारित किया गया, जो असंगत और अवैध है।

सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति रविन्द्र अग्रवाल की एकलपीठ ने आदेश सुरक्षित रख लिया था। दिनांक 24 सितंबर 2025 को निर्णय सुनाते हुए अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों को स्वीकार किया और निलंबन आदेश को निरस्त कर दिया।

गौरतलब है कि जय सिंह भारद्वाज वर्तमान में डौंडी के प्रभारी बीईओ के पद पर कार्यरत थे। उन्हें युक्तियुक्तकरण प्रक्रिया के दौरान हुई कथित अनियमितताओं के आरोप में निलंबित किया गया था। लेकिन जांच और साक्ष्यों की ठोस पुष्टि से पहले ही आदेश पारित कर दिया गया, जिसे अदालत ने उचित नहीं माना।

इस फैसले का असर सिर्फ याचिकाकर्ता तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विभागीय प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करता है। अदालत के इस निर्णय से यह संदेश गया है कि शासन के किसी भी आदेश को नियम और विधिक प्रावधानों के दायरे में ही पारित किया जाना चाहिए।

सेवानिवृत्ति के पहले राहत

जय सिंह भारद्वाज को इस आदेश से बड़ी राहत मिली है। वे इसी माह 30 सितंबर को सेवानिवृत्त होने वाले हैं। निलंबन निरस्त होने से अब वे सेवा निवृत्ति की कार्यवाही सम्मानजनक ढंग से पूरी कर सकेंगे।

अधिवक्ता का पक्ष

अधिवक्ता अजय श्रीवास्तव ने निर्णय पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह न्यायालय का संतुलित और न्यायोचित आदेश है। इससे स्पष्ट होता है कि प्रशासनिक स्तर पर पारित किसी भी आदेश को विधिक मानकों के अनुरूप ही होना चाहिए।

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